जानिए इन 11 बातों से, ‘बरेली की बर्फी’ में स्वाद है या नहीं

जानिए इन 11 बातों से, ‘बरेली की बर्फी’ में स्वाद है या नहीं
1. बरेली के मिश्रा सदन में रहने वाली बिट्टी मिश्रा (कृति सैनन) को पिता ने बेटे की तरह पाला है। वह पिता के पैकेट से सिगरेट निकाल कर पीती है, शराब से उसे परहेज नहीं, बड़ों का सम्मान करना उसने सीखा नहीं, आधी रात तक घर से बाहर रहती है, सारे शहर में डीजे की कमी पूरी करती है और खुली छत पर डांस करती है।
2. लड़के वाले बार-बार आते हैं और उसके ये गुण देख कर रिश्ता रिजेक्ट कर देते हैं। मां परेशान है। पिता को लगता है कि लड़की जब तक रहती है तब तक लगता है कब विदा होगी और जब जाने लगती है तो सोचते हैं कि उसके बिना कैसे रहेंगे।
3. बिट्टी की सोच है कि आखिर उसमें क्या कमी है? उसमें जो बातें हैं, अगर वह किसी लड़के में हों तो क्या कोई गलत समझेगा? पिता समझाते हैं कि यह समाज है, भले ही हम इसे न मानें मगर रहना तो इसी के बीच है।
4. मुद्दा यह कि क्या बिट्टी के लायक कोई लड़का मिलेगा? बिट्टी की शादी क्या कभी हो पाएगी? ‘बरेली की बर्फी’ इन्हीं सवालों के जवाब ढूंढती है।
5. फिल्म की अच्छी बात यह कि कहीं-कहीं रोचक है। कुछ संवाद आकर्षक और गुदगुदाते हैं। रोमांस-कॉमडी का संतुलन है।
6. कृति सैनन किरदार में फिट हैं। संवाद अदायगी और हाव-भाव से वह भरोसा दिलाती हैं कि आने वाले दिनों में दीपिका पादुकोण की जगह ले सकती हैं।
7. फिल्म की मुश्किल यह है कि कस्बाई नायक-नायिका जरूरत से ज्यादा फिल्मी हैं। कहानी की रफ्तार धीमी है। फिल्म जब तक संभलती है क्लाइमेक्स आ जाता है, जो निराश करता है।
8. अगर आपने अश्विनी अय्यर तिवारी कि ‘निल बटे सन्नाटा’ देखी है तो आपकी निराशा बढ़ जाएगी क्योंकि ‘बरेली की बर्फी’ जुबान पर खास मिठास नहीं छोड़ती। अश्विनी फिल्म को लगातार नाटकीय बनाए रखने की कोशिश करती हैं और इससे कहानी कमजोर पड़ती है।
9. सहज प्रवाह के अभाव में अंत आते-आते फिल्म फीकी पड़ जाती है। राजकुमार राव कमजोर किरदार में हैं। जिसकी जिम्मेदारी लेखकों की है।
10. आयुष्मान ने अपनी भूमिका ठीक ढंग से निभाई परंतु उनमें वह दमखम नहीं कि हीरो के रूप में अकेले फिल्म खींचें।
11. बिट्टी के मां-पिता के रूप में सीमा भार्गव और पंकज त्रिपाठी फिल्म को कई मौकों पर संभालते हैं। गीत-संगीत में उल्लेखनीय बात यहां नहीं हैं। फिल्म में रंग जरूर चटख हैं।

Comments